डॉ. हेमेन्द्र कुमार सिंह
- जैव विविधता शब्द पृथ्वी पर रहने वाले समस्त जैविक प्रजातियों के अपने में समाहित की हुई है इनमें समस्त प्रकार के स्तनधारी, पक्षी प्रजातियाँ, सरीसृप, उभयचर, मछली प्रजातियाँ, कीड़े-मकोड़े, पेड़-पौधे, शैवाल, कवक तथा प्रोटोजोआ, बैक्टीरिया, वायरस आदि सूक्ष्म जीव शामिल है। यह विविधता आनुवांशिक जाति और पारिस्थितिकी तंत्र प्रकार की होती है जो पर्यावरण संतुलन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
- क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यहाँ 60 प्रतिशत भू-भाग पर शुष्क और अर्द्धशुष्क मरुस्थलीय प्रदेश है, तो मध्य में अरावली पर्वत श्रेणी का विस्तार है। दक्षिणी-पूर्वी भाग पठारी है तो पूर्वी मैदानी प्रदेश नदियों द्वारा निर्मित है। यही भौगोलिक विविधता राजस्थान की जैव विविधता को आधार प्रदान करती है। इसी कारण से राजस्थान एक जैव विविधता समद्ध प्रदेश है।
- राजस्थान में लगभग 2500 प्रजातियों के पेड़ पौधे, 450 प्रजातियों के पक्षी, 50 प्रजातियों के स्तनपायी, 58 प्रकार के सरीसृप, 12 प्रजातियों के उभयचर पाये जाते हैं।
- जैव विविधता के अध्ययन की दृष्टि से राजस्थान को चार विशिष्ट जैव विविधता क्षेत्रें में विभक्त किया जा सकता है-
1. पश्चिमी मरुस्थलीय प्रदेशः
- राजस्थान में पश्चिमी क्षेत्र में शुष्क तथा अर्द्धशुष्क मरुस्थल का विस्तार है। यहाँ की प्रमुख विशेषता कम वर्षा, उच्च तापमान तथा शुष्कता है। इसी कारण ही यहाँ के जीव-जन्तुओं एवं वनस्पतियों में भी विभिन्नता देखी जाती है। यहाँ पेड़-पौधों में काँटेदार वनस्पति, कंटीली झाड़ियाँ, घास तथा ऐसे जीव अधिक पाए जाते हैं जिन्हें पानी की कम जरूरत होती है। यहाँ पाए जाने वाले जन्तुओं में प्रमुख जन्तु चिंकारा, काला हिरण, मरु बिल्ली, लोमड़ी, भेड़िया, खरगोश और नेवला है।
2. मध्य अरावली पर्वत प्रदेशः
- राज्य के मध्य में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर अरावली पर्वत श्रंखला का विस्तार है। यह अवशिष्ट पर्वत का उदाहरण है जो कि जैवविविधता से सम्पन्न है। अरावली पर्वतमाला के दक्षिणी भाग में आज भी वनों का पर्याप्त विस्तार है। जहाँ सालर, धौक, महुआ, आम, बाँस, चुरैल आदि की वनस्पति प्रजातियाँ तथा बघेरा, रीछ, जरख, चीतल, सांभर, चौसिंगा, जंगली सुअर, भेड़िया, लोमड़ी, उड़न गिलहरी आदि वन्यजीव पाये जाते हैं।
3. पूर्वी मैदानी प्रदेशः
- यह अरावली पर्वतमाला के पूर्व में स्थित है एवं गंगा-यमुना के मैदान भाग का हिस्सा है। इस क्षेत्र में मुख्यतः राजस्थान के भरतपुर और धौलपुर जिले आते हैं। इस क्षेत्र में नहर, तालाब, पोखर आदि जल स्रोत बड़ी संख्या में है जिस कारण यहाँ पक्षियों और प्रवासी पक्षियों की संख्या अधिक पायी जाती है।
4. दक्षिणी-पूर्वी पठारी प्रदेशः
- इस प्रदेश को हाड़ौती के पठार के नाम से भी जाना जाता है। हाड़ौती के पठार के एक ओर मुकंदरा की पहाड़ियाँ तो दूसरी ओर चम्बल नदी क्षेत्र है, इस कारण से यहाँ जैव विविधता अधिक देखने को मिलती है।
- चम्बल नदी में मगरमच्छ, घड़ियाल, डाल्फिन, कछुए, विभिन्न प्रकार की मछलियाँ, केंकड़े आदि मिलते हैं।
राजस्थान की ईको-टूरिज्म साइट्स-
जैव विविधता संरक्षण
जैव विविधता के संरक्षण के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। जैसे- जैव विविधता वाले क्षेत्रें को राष्ट्रीय उद्यान, वन्य जीव अभयारण्य तथा आरक्षित एवं संरक्षित क्षेत्र घोषित करना आदि।
जैव विविधता संरक्षण सामान्यतः दो प्रकार से किया जाता है-
राजस्थान के राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभयारण्यः-
ऐसा प्राकृतिक स्थान जहाँ जीव-जन्तुओं को प्राकृतिक आवास में ही संरक्षित किया जाता है, राष्ट्रीय उद्यान कहते हैं। भारत का पहला राष्ट्रीय उद्यान हैली नेशनल पार्क (1936) था। जिसे वर्तमान में जिम कार्बेट नेशनल पार्क के नाम से जाना जाता है। जिसे रामगंगा नेशनल पार्क के नाम से भी जाना जाता है।
वर्तमान में राज्य में 3 नेशनल पार्क हैं-
1. रणथम्भौर नेशनल पार्क (सवाई माधोपुर):-
- राजस्थान का प्रथम वन्यजीव अभयारण्य है जिसे वन्य जीव अभयारण्य का दर्जा 1955 में दिया गया था और 1 नवंबर, 1980 में इसे राष्ट्रीय उद्यान घोषित कर दिया गया। सवाई माधोपुर के पास रणथम्भौर के चारों तरफ फैला यह राष्ट्रीय उद्यान बाघ संरक्षण स्थल है। इसका विस्तार 282.03 वर्ग किलोमीटर में है।
- राष्ट्रीय बाघ संरक्षण परियोजना का क्रियान्वयन 1973 से किया जा रहा है इसे ‘Land of Tiger’ भी कहते हैं।
- यहाँ का मुख्य आकर्षण केन्द्र बाघ है, इसके अतिरिक्त यहाँ गीदड़, बघेरा, जंगली सूअर, बिज्जू, भेड़िया, सांभर, लंगूर, चीतल, हिरण व नीलगाय भी पाये जाते हैं। जबकि दूसरा मुख्य आकर्षण मगरमच्छ हैं।
- इसके दक्षिण में चम्बल एवं उत्तर में बनास नदी है।
2. केवलादेव राष्ट्रीय उद्यानः-
- यहाँ वनस्पतियाँ काफी घनी होने के कारण इस घना अभयारण्य के नाम से भी जाना जाता है। यह भरतपुर जिले में स्थित है। इसे 1956 में पक्षी अभयारण्य घोषित किया गया। 27 अगस्त, 1981 में राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया। 1985 में यूनेस्को की विश्व प्राकृतिक धरोहर सूची में शामिल किया गया। इसे 1981 में रामसर साइट घोषित किया गया। इसे पक्षियों का स्वर्ग कहा जाता है।
- यह एशिया में पक्षियों का सबसे बड़ा प्रजनन क्षेत्र है, इसका क्षेत्रफल 28.73 वर्ग किमी है, जिसमें से 11 वर्ग किमी में झील है।
- यहाँ राज्य की प्रथम वन्यजीव प्रयोगशाला स्थापित है।
- सफेद साइबेरियाई क्रेन यहाँ का प्रमुख आकर्षण है। यह यहाँ अक्टूबर-नवंबर में आता है और फरवरी-मार्च में वापस चला जाता है।
- कदम्ब के वृक्ष यहाँ बहुतायत में पाये जाते हैं। इसे पानी अजान बांध से मिलता है और यहाँ बाणगंगा और गम्भीरी नदी बहती है।
- यह गोल्डन ट्राइएंगल (स्वर्णिम त्रिकोण)(जयपुर-आगरा- दिल्ली) पर अवस्थित होने के कारण पर्यटकों के आकर्षण का केन्द्र है।
- यह अभयारण्य डॉ. सलीम अली की कर्मस्थली है।
- यहाँ ऑस्ट्रियन सॉरोस्कि के आर्थिक सहयोग व WWf के निर्देशन में सलीम अली इंटरप्रिटेशन सेंटर वर्ष 2006 में खोला है।
- केवलादेव उद्यान को WBHCC के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसके लिए जनवरी 2022 में वर्ल्ड वाइल्ड फण्ड के साथ एमओयू हुआ है।
3. मुकंदरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यानः (पुराना नाम दर्रा अभयारण्य)
- इसे 1 नवंबर, 1955 को अभयारण्य घोषित किया गया। इस राष्ट्रीय उद्यान का विस्तार 199.55 वर्ग किमी है जिसमें दर्रा वन्य जीव अभयारण्य, जवाहर सागर वन्य जीव अभयारण्य तथा राष्ट्रीय चम्बल अभयारण्य शामिल है।
- मुकंदरा की पहाड़ियाँ सघन वनों से युक्त हैं यहाँ आदिमानव के शैलाश्रय तथा उनके द्वारा बनाये गये शैलचित्र देखने को मिलते हैं।
- यह कोटा एवं चित्तौड़गढ़ जिले में विस्तृत है।
- यहाँ वन्य जीवों में चीता, तेंदुआ, रीछ, हिरण, सांभर, जंगली सूअर, चीतल और नीलगाय आदि पाये जाते हैं।
- यह गागरोनी तोते के लिए प्रसिद्ध है जिसका वैज्ञानिक नाम ‘सिटाकुला यूपेट्रिया/एलेक्जेण्ड्रिया पेराकीट’ है।
राजस्थान के वन्य जीव अभयारण्यः
1. राष्ट्रीय मरुउद्यान, जैसलमेरः
- राजस्थान के पश्चिमी शुष्क भाग में स्थित राष्ट्रीय मरुउद्यान की स्थापना 1981 में की गई। इसका प्रमुख उद्देश्य यहाँ की प्राकृतिक वनस्पति और लाखों-करोड़ों वर्षों से जमीन में दबे जीवाश्मों को संरक्षण प्रदान करना। इसलिए इसे जीवाश्म उद्यान (आकलवुड फोसिल पार्क) भी कहते हैं।
- राष्ट्रीय मरुउद्यान का विस्तार राजस्थान के जैसलमेर (1900 किमी.) और बाड़मेर (1262 किमी.) जिलों में 3162 वर्ग किमी. में विस्तृत है।
2. सरिस्का वन्य जीव अभयारण्यः
- यह वन्य जीव अभयारण्य अलवर में स्थित है एवं 544.22 वर्ग किमी- में विस्तृत है। राज्य सरकार ने 1955 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया। यहाँ केन्द्र सरकार द्वारा बाघ परियोजना चालू की गयी है।
- यहाँ मुख्य रूप से बाघ, हरे कबूतर (हरियल) सांभर, चीतल, नीलगाय, काला खरगोश, जंगली सूअर, लंगूर और अनेक पक्षी निवास करते हैं।
- यहाँ क्रासका व कांकवाड़ी पठार स्थित हैं।
- यह रीसस बंदर के लिए प्रसिद्ध है। 9 जनवरी, 2012 को इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा दिया गया।
3. नाहरगढ़ अभयारण्यः
- यह राजस्थान के आमेर दुर्ग, नाहरगढ़ तथा जयगढ़ के चारों ओर फैला हुआ है, जिसे 1980 में अभयारण्य बनाया गया है। यह अभयारण्य 52.40 वर्ग किमी में विस्तृत है। इस अभयारण्य में लंगूर, सेही और पाटागोह की प्रधानता है। यहाँ जैविक उद्यान स्थित है। यहाँ देश का तीसरा बीयर रेस्क्यू सेंटर स्थापित किया गया है।
4. जमवारामगढ़ अभयारण्यः
- 1982 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया। यह अभयारण्य लगभग 300 वर्ग किमी. में फैला हुआ है। यहाँ पर बघेरा, जंगली सूअर, जंगली बिल्ली, भेड़िया, नीलगाय और सांभर आदि वन्य जीव मिलते हैं।
5. जयसमंद अभयारण्य (1955):
- सलूम्बर में 52.34 वर्ग किमी- में विस्तृत, जससमंद झील के किनारे पहाड़ियों पर स्थित अभयारण्य है। यहाँ मुख्य रूप से रीछ, जंगली सूअर, नीलगाय, तेंदुआ आदि वन्य जीवों की संरक्षण स्थली है।
6. तालछापर कृष्ण मृग अभयारण्य (1962):
- सुजानगढ़ (चुरू), तालछापर अभयारण्य में काले हिरण व कुरंजा देखने को मिलते हैं। यह 7.19 वर्ग किमी. में फैला हुआ है। यहाँ एशिया का सबसे बड़ा कृष्ण मृग है। यहाँ मकड़ी की दुर्लभ प्रजाति ‘‘ग्रीन लिंक्स’’ पायी जाती है। यह एशिया की सबसे बड़ी कृष्ण मृग अभयारण्य है यहाँ मोथिया नामक गर्म घास (मोचिया साइप्रस रोटेण्डस) पाई जाती है जो कृष्णमृग को प्रिय है।
7. बस्सी अभयारण्य (1988)-
- यह अभयारण्य चित्तौड़ में स्थित, 138.69 वर्ग किमी- में फैला है। इसे वर्ष 1988 में वन्य जीव अभयारण्य घोषित किया गया है।
- यह अरावली और विंध्याचल पर्वतमालाओं के मिलन स्थल पर स्थित है यहाँ चौसिंघा, बघेरे, सैण्डग्राउज, जंगली बिल्ली और मगरमच्छ देखने को मिलते हैं।
8. फुलवारी की नालः
- वर्ष 1983 में स्थापित उदयपुर के पिछड़े और शांत क्षेत्र फुलवारी की नाल अरावली पर्वतमाला के मध्य में स्थित, वन्य जीव अभयारण्य है। 511.41 वर्ग किमी. में विस्तृत। यहाँ से सोम, मानसी और वाकल आदि नदियाँ निकलती हैं।
- यहाँ पाये जाने वाले सघन वनों में बाघ, बघेरा, सांभर चीतल वन्य जीवों के साथ अनेक प्रजातियों के पक्षी देखे जा सकते हैं। यहाँ देश का पहला ह्यूमन एनोटॉमी पार्क विकसित किया जा रहा है।
9. भैंसरोड़गढ़ अभयारण्यः
- चित्तौड़गढ़ के पर्वतीय क्षेत्र में 273.54 वर्ग किमी- में फैला हुआ है जिसे 1983 में अभयारण्य घोषित किया गया था। जलीय अभयारण्य जो घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ सैकड़ों प्रकार के पक्षियों के अतिरिक्त लकडबग्घा, बघेरा, नीलगाय, जंगली सूअर, चीतल, लंगूर, चिंकारा, लोमड़ी व गीदड़ पाये जाते हैं।
10. सज्जनगढ़ अभयारण्यः
- उदयपुर स्थित यह राजस्थान का सबसे छोटा अभयारण्य है। जिसे 1987 में अभयारण्य दर्जा मिला। लगभग 5.19 वर्ग किमी में विस्तृत इस अभयारण्य में शेर, नीलगाय, चीतल, लंगूर, जंगली सूअर, चिंकारा, कृष्णमृग, सांभर आदि वन्य जीव देखे जा सकते हैं।
11. बन्ध बरेठा अभयारण्यः
- वर्ष 1985 को अभयारण्य बना जो लगभग 170.65 वर्ग किमी- में विस्तृत है। यह कुकुंद नदी पर बारेठा नामक स्थान पर एक बांध बनाया गया। और यहाँ अनेक प्रजातियों के वन्य जीव व पक्षी सुरक्षित है। यह अभयारण्य परिंदों के घर उपनाम से प्रसिद्ध, जरखों के लिए प्रसिद्ध है।
12. राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्यः
- वर्ष 1979 में अभयारण्य घोषित। यह अभयारण्य 564.03 वर्ग किमी- के जलीय क्षेत्र में विस्तृत है। चम्बल नदी पर राणा प्रतापसागर में नदी के जल बहाव तक इसका फैलाव है। यह घड़ियालों का संसार/जलीय जीवों की प्रजनन स्थली है। इस अभयारण्य में गांगेय सूस (नेत्रहीन डॉल्फिन) नामक स्तनपायी पायी जाती है।
13. टाडगढ़ रावली अभयारण्यः
- यह अभयारण्य राजस्थान के तीन जिलों ब्यावर, पाली और राजसमंद में विस्तृत है। 495.27 वर्ग किमी- में विस्तृत। जिसे 1983 में वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया। यहाँ मुख्य रूप से जरख, रीछ, गीदड़, बंदर तथा नीलगाय आदि वन्य जीव निवास करते हैं। यह अभयारण्य राज्य के तीन संभागों (अजमेर, जोधपुर, उदयपुर) में विस्तृत है। इसमें कामली घाट और गोरमघाट दर्रे है ।
14. रामगढ़ विषधारी अभयारण्यः
- बूंदी जिले में स्थित इसे 1982 में अभयारण्य घोषित किया गया है। यह अभयारण्य 303.05 वर्ग किमी- के क्षेत्रफल में विस्तृत है। इसे प्राचीनकाल से ही बाघ-बघेरों का घर माना जाता है। इसके अलावा यहाँ जरख, रीछ, गीदड़, नीलगाय, चीतल, चिंकारा, भेड़िया, लोमड़ी, नेवला, जंगली सूअर आदि देखे जा सकते हैं। राजस्थान का चौथा और देश का 52वाँ टाईगर रिजर्व बनाया गया है। इसे रणथम्भौर के बांधों का जच्चाघर भी कहा जाता है।
15. रामसागर वन विहार अभयारण्यः
- धौलपुर में स्थित, इसे 1955 में अभयारण्य घोषित किया गया जो कि 34.40 वर्ग किमी. में विस्तृत है। झील के किनारे पर स्थित होने के कारण पानी के पास पाये जाने वाले पक्षी भी मिलते हैं। प्रमुख वन्य जीव- जंगली सूअर, सांभर, नीलगाय, चीतल, सांभर, तीतर और मोर पाये जाते हैं।